क्या कुरखेड़ा एसडीएम-तहसीलदार तलाठी के ‘आशीर्वाद’ से हो रही रेत तस्करी?

  गढचिरौली, ब्यूरो : गढ़चिरौली जिले के कुरखेड़ा तहसील में भारी बारिश के बावजूद रेत तस्करी का कथित खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। आरोप है कि रात के अंधेरे का फायदा उठाकर सती नदी से बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही है और वाहनों के जरिए उसका अवैध परिवहन किया जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में राजस्व विभाग का प्रशासनिक तंत्र मौजूद है, वहां रात के समय कथित रूप से लाखों रुपये की रेत का कारोबार कैसे चल रहा है? स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि रेत तस्करों को राजस्व विभाग के कुछ अधिकारी-कर्मचारियों का कथित संरक्षण प्राप्त है। इसी के चलते अब सवाल सीधे कुरखेड़ा के एसडीएम, तहसीलदार और संबंधित तलाठी की भूमिका पर उठ रहे हैं—क्या रेत तस्करों के हौसले प्रशासन के कथित ‘आशीर्वाद’ के कारण इतने बुलंद हैं?

भारी बारिश में भी नदी से निकल रही रेत

इन दिनों कुरखेड़ा तहसील में भारी बारिश का दौर चल रहा है। नदी-नालों का जलस्तर बढ़ा हुआ है और सामान्य लोगों के लिए नदी किनारे पहुंचना भी मुश्किल है। इसके बावजूद आरोप है कि रात के समय सती नदी क्षेत्र में रेत तस्करों की गतिविधियां जारी रहती हैं। कथित रूप से नदी से रेत निकालकर वाहनों में भरी जाती है और अंधेरे में उसे अन्य स्थानों पर पहुंचाया जाता है। बारिश और रात का फायदा उठाकर यह पूरा खेल चलने का आरोप है। सवाल यह है कि अगर यह गतिविधि लगातार हो रही है तो स्थानीय प्रशासन और राजस्व विभाग की निगरानी व्यवस्था इसे रोकने में क्यों नाकाम दिखाई दे रही है?

तस्करों को कार्रवाई से पहले मिल जाती है सूचना?

स्थानीय लोगों की ओर से सबसे गंभीर आरोप यह लगाया जा रहा है कि जब राजस्व विभाग के अधिकारी या कर्मचारी गश्त के लिए निकलते हैं, तो रेत तस्करों को कथित रूप से पहले ही इसकी भनक लग जाती है। अधिकारी किस दिशा में जा रहे हैं और किस इलाके में जांच हो सकती है, इसकी जानकारी तस्करों तक पहुंचने के बाद कथित रूप से नदी घाट और रास्ते खाली कर दिए जाते हैं। अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं तो वहां कुछ दिखाई नहीं देता। यदि यह आरोप सही है तो सवाल सिर्फ रेत तस्करी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर से सूचना लीक होने का भी है। आखिर कार्रवाई से पहले तस्करों को सूचना कौन देता है?

गश्त होती है, लेकिन कार्रवाई कहां है?

रेत तस्करी रोकने के लिए प्रशासन की ओर से गश्त और निगरानी की जाती है, लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि गश्त के बावजूद रात में रेत से भरे वाहन निकल रहे हैं तो कार्रवाई का परिणाम दिखाई क्यों नहीं देता? कितने वाहन पकड़े गए? कितनी रेत जब्त की गई? कितने लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए? कितना दंड वसूल किया गया? और सबसे अहम सवाल—सती नदी से कथित रूप से हो रहे अवैध उत्खनन पर अब तक कितनी ठोस कार्रवाई की गई? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।

एसडीएम-तहसीलदार-तलाठी की भूमिका पर सवाल

तहसील स्तर पर राजस्व प्रशासन की जिम्मेदारी होने के कारण रेत तस्करी के आरोपों के बीच एसडीएम, तहसीलदार और संबंधित तलाठी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि अधिकारियों को नदी से अवैध रेत उत्खनन और परिवहन की जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? यदि जानकारी नहीं है तो स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है। और यदि अधिकारी कार्रवाई के लिए निकलते हैं, लेकिन तस्कर पहले ही वहां से गायब हो जाते हैं, तो आखिर उन्हें सूचना कहां से मिलती है? क्या राजस्व विभाग के भीतर से ही तस्करों को संरक्षण या सूचना मिल रही है? यह जांच का विषय है।

शहर के विकास कार्यों में भी बिना रॉयल्टी रेत?

कुरखेड़ा शहर में चल रहे विभिन्न विकास कार्यों में सती नदी की रेत कथित रूप से बिना रॉयल्टी के परिवहन किए जाने की चर्चा भी अब जोर पकड़ रही है। सवाल यह है कि यदि शहर में दिनदहाड़े विकास कार्यों के लिए बिना रॉयल्टी रेत पहुंच रही है तो क्या इसकी जानकारी तहसीलदार, एसडीएम और संबंधित तलाठी को नहीं है? अगर जानकारी नहीं है तो फिर सवाल उठता है कि राजस्व प्रशासन की निगरानी आखिर कहां है और अधिकारी क्षेत्र में क्या देख रहे हैं? और अगर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही है तो फिर इसके पीछे वजह क्या है? सरकार का राजस्व बढ़ाना प्रशासन की प्राथमिकता है या फिर किसी की ‘जेब भरने’ का खेल चल रहा है—इस पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। कुरखेड़ा शहर में चर्चा है कि रेत तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें प्रशासन का कोई डर नहीं रह गया है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि “कोई कुछ भी कर ले, एसडीएम, तहसीलदार और तलाठी तस्करों का बाल भी बांका नहीं कर सकते।” हालांकि इन चर्चाओं और आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है, लेकिन यदि शहर के विकास कार्यों में भी बिना रॉयल्टी रेत के उपयोग या परिवहन की बात सही पाई जाती है तो यह सरकारी राजस्व के साथ-साथ प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।

लाखों का राजस्व डूबने का आरोप

रेत का अवैध उत्खनन केवल पर्यावरण और नदी के अस्तित्व से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि इससे शासन के राजस्व को भी नुकसान होने का आरोप है। यदि रेत वैध प्रक्रिया और रॉयल्टी के बिना निकाली और परिवहन की जा रही है, तो सरकार को मिलने वाला राजस्व सीधे प्रभावित होता है। दूसरी ओर तस्करों के लिए यह कथित रूप से लाखों रुपये का अवैध कारोबार बन जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी राजस्व की इस कथित चोरी को रोकने के लिए प्रशासन कितनी गंभीरता से काम कर रहा है।

रेत तस्कर बने ‘गब्बर’, प्रशासन क्यों बेबस?

स्थानीय लोगों में चर्चा है कि कुरखेड़ा तहसील में रेत तस्करों के हौसले लगातार बढ़ रहे हैं। अगर तस्करों को प्रशासनिक गतिविधियों की पहले से जानकारी मिल रही है और कार्रवाई से पहले वाहन गायब हो जाते हैं, तो निश्चित रूप से यह गंभीर जांच का विषय है। क्या तस्करों को किसी अधिकारी या कर्मचारी का संरक्षण प्राप्त है? क्या उन्हें कार्रवाई से पहले सूचना दी जाती है? या फिर प्रशासनिक निगरानी तंत्र इतना कमजोर है कि तस्कर खुलेआम अपना खेल चला रहे हैं? इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है।

‘आशीर्वाद’ है या प्रशासन की नाकामी?

कुरखेड़ा एसडीएम, तहसीलदार और संबंधित तलाठी पर लग रहे कथित मिलीभगत के आरोप बेहद गंभीर हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि रेत तस्करी रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है। कितने घाटों की जांच हुई, कितने वाहन जब्त किए गए और कितने लोगों पर कार्रवाई हुई—इसका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं अगर जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

अब सवाल सीधे प्रशासन से

सती नदी से अगर रात के अंधेरे में रेत निकाली जा रही है तो प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं? अगर जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं? अगर कार्रवाई होती है तो उससे पहले तस्करों तक खबर कैसे पहुंचती है? एसडीएम, तहसीलदार और तलाठी के स्तर पर कितनी बार जांच की गई? कितने वाहन पकड़े गए? कितनी रेत जब्त हुई? शासन के खाते में कितना राजस्व जमा हुआ? और अगर यह सब नहीं हो रहा है तो फिर राजस्व विभाग की निगरानी व्यवस्था किस काम की है?

कुरखेड़ा में अब सवाल सिर्फ रेत तस्करी का नहीं है। सवाल यह है कि सती नदी की रेत कौन लूट रहा है, सरकारी राजस्व को कितना नुकसान हो रहा है और इस पूरे खेल को रोकने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, उनकी निगरानी में यह कथित कारोबार आखिर कैसे चल रहा है?

अगर ‘आशीर्वाद’ नहीं है तो तस्करों पर कार्रवाई दिखाइए; और अगर किसी स्तर पर मिलीभगत है तो निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई कीजिए। कुरखेड़ा की जनता अब सिर्फ गश्त नहीं, नतीजा चाहती है।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज…

 

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