नक्सलमुक्त गढचिरौली में रेत माफिया का ‘बंदूक राज’

माओवाद से काफी हद तक मुक्त हो चुके गढचिरौली जिले में अब एक नया और खतरनाक नेटवर्क तेजी से जड़ें जमा रहा है। कभी नक्सलियों के साए में रहने वाला यह जिला अब रेत माफियाओं के ‘बंदूक राज’ की गिरफ्त में आता नजर आ रहा है। जिले में बड़े पैमाने पर अवैध रेत उत्खनन और परिवहन जारी है, जिसमें हथियारों का खुला इस्तेमाल होने के आरोप सामने आ रहे हैं। हालात यह हैं कि करोड़ों रुपये के इस अवैध कारोबार ने पूरे जिले को अपनी चपेट में ले लिया है और प्रशासन की भूमिका पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं।

बंदूक के साए में संगठित रेत तस्करी का फैलता जाल

जिले के विभिन्न रेत घाटों पर रात होते ही गतिविधियां तेज हो जाती हैं। स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के मुताबिक, हथियारबंद तस्कर गिरोह के रूप में काम कर रहे हैं, जो जेसीबी मशीनों, पोकलेन और सैकड़ों टिप्परों के जरिए बड़े पैमाने पर रेत का अवैध उत्खनन कर रहे हैं। यह पूरा नेटवर्क इतना संगठित बताया जा रहा है कि घाट से लेकर परिवहन और बाहर सप्लाई तक एक चेन के रूप में काम हो रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर कोई इस अवैध काम का विरोध करता है तो उसे सीधे जान से मारने की धमकी दी जाती है। कई जगहों पर तो तस्कर खुलेआम कहते सुने गए हैं कि “हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” इससे साफ है कि कानून का डर खत्म होता जा रहा है और तस्करों का मनोबल लगातार बढ़ रहा है।

प्रशासन की चुप्पी—अनदेखी, लापरवाही या मिलीभगत?

इतने बड़े पैमाने पर हो रही तस्करी के बावजूद प्रशासन की तरफ से ठोस और प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। यही कारण है कि अब प्रशासन की भूमिका पर सीधे सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल में कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हैं, जो आर्थिक लाभ के लिए तस्करों को संरक्षण दे रहे हैं।

इसी बीच 16 अप्रैल को गढचिरौली के दो पत्रकारों ने जिलाधिकारी अविशांत पंडा से मुलाकात कर जिले में चल रही अवैध रेत तस्करी के मुद्दे पर चर्चा की। इस दौरान जिलाधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि “रेत के मामले में मुझे कुछ नहीं कहना है, जब तक मुझे लिखित शिकायत नहीं मिलती, तब तक मैं इस विषय पर बात नहीं करूंगा।”

जिलाधिकारी के इस बयान ने मामले को और हवा दे दी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब मामला करोड़ों रुपये के नुकसान और कानून व्यवस्था से जुड़ा हो, तो क्या प्रशासन को खुद ही संज्ञान नहीं लेना चाहिए? क्या यह चुप्पी किसी दबाव का परिणाम है या फिर अंदरूनी मिलीभगत का संकेत? सूत्रों के मुताबिक, कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में बताई जा रही है, जिससे तस्करों के हौसले और बुलंद हो रहे हैं।

 सरकारी नीतियों का दुरुपयोग, बढ़ता अवैध कारोबार

शासन द्वारा रेत घाटों की नीलामी और 24 घंटे रेत परिवहन की अनुमति देने का उद्देश्य व्यवस्था को पारदर्शी बनाना था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। इन नीतियों की आड़ में अवैध उत्खनन और तस्करी को बढ़ावा मिला है।

जिले में रॉयल्टी के साथ ली जाने वाली रेत की मात्रा कम दिखाई जा रही है, जबकि बिना रॉयल्टी की रेत बड़े पैमाने पर दूसरे जिलों और शहरों में पहुंचाई जा रही है। इससे शासन को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है।

कुरखेडा तहसील में तारा मंगल एजेंसी का मामला भी इसी अव्यवस्था की एक बड़ी मिसाल है, जहां बिना अनुमति 786 ब्रास रेत डंप करने के बावजूद करीब 1 करोड़ 46 लाख रुपये की वसूली अब तक अधूरी है। इस तरह के मामलों से यह संदेह और गहरा हो जाता है कि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित है।

नक्सलवाद के बाद ‘बंदूक संस्कृति’ का नया रूप

गढचिरौली जिला एक समय नक्सलवाद के लिए जाना जाता था, जहां बंदूकें नक्सलियों के हाथ में थीं और ग्रामीण इलाकों में उनका दबदबा था। उस दौर में प्रशासन की पहुंच सीमित थी और कई फैसले हालात के अनुसार लिए जाते थे।

लेकिन अब जब नक्सल प्रभाव काफी हद तक कम हो चुका है, तब भी बंदूक का डर खत्म नहीं हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह डर नक्सलियों के बजाय रेत तस्करों के रूप में सामने आ रहा है। यह स्थिति और भी चिंताजनक है, क्योंकि अब यह अवैध कारोबार के साथ जुड़ गया है, जिससे आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह का नुकसान हो रहा है।

यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या नक्सलवाद के खत्म होने के बाद जो “खाली जगह” बनी, उसे अब अवैध रेत कारोबार ने भर दिया है? अगर ऐसा है, तो यह प्रशासन के लिए एक नई और गंभीर चुनौती बन सकती है।

करोड़ों का खेल—किसे फायदा, किसे नुकसान?

जिले में चल रहे इस अवैध कारोबार से जहां तस्कर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं, वहीं शासन को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस पूरे खेल में कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी आर्थिक लाभ ले रहे हैं।

जिले में यह चर्चा भी जोरों पर है कि तस्करों की सेटिंग ऊपर तक है— कुछ मामलों में नेताओं और अधिकारियों के नाम भी सामने आ रहे हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कार्रवाई की धीमी गति और चयनात्मक कदम कई सवाल खड़े करते हैं।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़…

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