रेती घाटों में नियमों की उड़ रही धज्जियां

बिना टीपी ट्रांसपोर्टिंग, ओवरलोडिंग और रातभर तस्करी; सिस्टम की मिलीभगत पर उठे गंभीर सवाल

जिले में रेती घाटों की नीलामी का उद्देश्य आम नागरिकों को सस्ती दरों पर निर्माण सामग्री उपलब्ध कराना और सरकार के राजस्व में वृद्धि करना होता है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। नीलामी के बाद ठेकेदारों द्वारा सरकारी नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है और रेती घाट अवैध उत्खनन व तस्करी के बड़े केंद्र बनते जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, ठेकेदार पहले नदी से बड़े पैमाने पर रेती का उत्खनन करते हैं और उसे एक स्थान पर डंप कर देते हैं। इसके बाद 24 घंटे ट्रांसपोर्टिंग की अनुमति का फायदा उठाकर रात के समय भारी मात्रा में रेती की ढुलाई की जाती है। इस दौरान न तो कोई प्रभावी निगरानी होती है और न ही नियमों का पालन किया जाता है।

 24 घंटे ट्रांसपोर्टिंग बना अवैध तस्करी का सबसे बड़ा जरिया

पहले सरकार द्वारा रेती परिवहन की अनुमति सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक सीमित थी, जिससे निगरानी करना अपेक्षाकृत आसान था। लेकिन अब 24 घंटे ट्रांसपोर्टिंग की अनुमति मिलने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है. रात के अंधेरे में बिना किसी रोक-टोक के रेती की तस्करी हो रही है। इस दौरान महसूल विभाग के अधिकारी और कर्मचारी मौके पर मौजूद नहीं रहते, जिससे ठेकेदारों को खुली छूट मिल जाती है।

कांग्रेस सांसद नामदेव किरसान ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि यदि ट्रांसपोर्टिंग 24 घंटे की है, तो निगरानी भी उतनी ही सख्ती से क्यों नहीं की जाती? उन्होंने इस संबंध में प्रशासन को पत्र लिखकर जांच की मांग की है।

बिना टीपी और ओवरलोडिंग से बढ़ रहा खेल

जिले में कई जगहों पर बिना ट्रांजिट पास (TP) के ही रेती का परिवहन किए जाने के आरोप हैं। इससे सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है. इसके अलावा ओवरलोडिंग भी आम बात हो गई है। जहां एक टिप्पर की क्षमता लगभग 5 टन होती है, वहीं उसमें 7 टन या उससे अधिक रेती भरकर परिवहन किया जा रहा है।

इस गंभीर नियम उल्लंघन के बावजूद न तो आरटीओ विभाग की ओर से सख्त कार्रवाई होती दिखाई दे रही है और न ही पुलिस या अन्य जिम्मेदार विभागों की ओर से कोई ठोस कदम उठाया जा रहा है।

मिलीभगत के आरोप, सिस्टम पर उठते सवाल

रेती तस्करी के लगातार बढ़ते मामलों के बावजूद कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े कर रहा है। इस पूरे खेल में कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों और राजनीतिक संरक्षण की भूमिका हो सकती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार पुलिस थानों के सामने से ही रेती से भरे ट्रक, टिप्पर और ट्रैक्टर गुजरते हैं, लेकिन उन्हें रोका नहीं जाता. इतना ही नहीं, यदि कोई नागरिक अवैध परिवहन की सूचना संबंधित अधिकारियों को देता है, तो पहले ही ठेकेदारों तक सूचना पहुंचा दी जाती है और वाहन मौके से गायब कर दिए जाते हैं. ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या सिस्टम की अंदरूनी मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर अवैध तस्करी संभव है?

ठेकेदार मालामाल, सरकार को करोड़ों का नुकसान

जानकारों के अनुसार, एक-एक रेती घाट से ठेकेदार करोड़ों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार का महसूल लगातार कम हो रहा है. सरकारी नियमों के अनुसार, ठेकेदार को 100 प्रतिशत उत्खनन की अनुमति होती है, लेकिन बिक्री केवल 90 प्रतिशत तक ही की जा सकती है, जबकि शेष 10 प्रतिशत रेती घरकुल लाभार्थियों को नि:शुल्क देना अनिवार्य है. लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया जाता और मंजूर ब्रास से अधिक रेती निकालकर अवैध रूप से बेच दी जाती है।

प्रशासन पर बढ़ा दबाव, कार्रवाई की मांग

लगातार सामने आ रही अनियमितताओं और तस्करी के मामलों के बीच अब प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ता जा रहा है. स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों की ओर से मांग की जा रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए और रेती घाटों पर पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाए।

अंत में बड़ा सवाल

क्या 24 घंटे ट्रांसपोर्टिंग की अनुमति ही अवैध तस्करी की सबसे बड़ी वजह बन गई है?
क्या बिना निगरानी के यह खेल यूं ही चलता रहेगा? और आखिर कब तक सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा?

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़…

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