कभी हाथ में थी बंदूक, अब आदिवासियों के अधिकारों के लिए संभालेंगे दस्तावेज; पेसा और वन अधिकार कानून पर ग्रामसभाओं को देंगे मार्गदर्शन
गढ़चिरौली ब्यूरो : नक्सली आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय रहे मुल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति के जीवन में अब एक नया अध्याय शुरू हुआ है। कभी जंगलों में हथियार के साथ सक्रिय रहने वाले भूपति अब आदिवासी समाज के अधिकारों और ग्रामसभाओं को मजबूत करने के लिए काम करेंगे। गोंडवाना विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘एकल’ उपक्रम में समन्वयक के रूप में नियुक्त किया है। इस नई जिम्मेदारी के तहत वे जिले के आदिवासी ग्रामीणों और ग्रामसभाओं को पेसा कानून तथा वन अधिकार कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों की जानकारी देंगे।
भूपति की यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के करीब चार दशक नक्सली आंदोलन में बिताए हैं और आदिवासी बहुल क्षेत्रों की सामाजिक परिस्थितियों तथा ग्रामीणों की समस्याओं को बेहद करीब से देखा है। अब इसी अनुभव का उपयोग वे आदिवासी समाज को संवैधानिक और कानूनी अधिकार दिलाने में करेंगे।
61 साथियों के साथ किया था आत्मसमर्पण
भूपति ने 15 अक्टूबर 2025 को गढ़चिरौली में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष अपने 61 साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। करीब 43 वर्षों तक नक्सली आंदोलन में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने हथियार छोड़कर लोकतंत्र और मुख्यधारा का रास्ता अपनाया।
आत्मसमर्पण के बाद उनके पुनर्वास और भविष्य की भूमिका को लेकर प्रशासन की ओर से भी प्रयास किए गए। इसी दौरान गढ़चिरौली के पुलिस अधीक्षक एम. रमेश ने आदिवासी समाज और क्षेत्र की समस्याओं को लेकर भूपति के अनुभव तथा उनकी जानकारी को ध्यान में रखते हुए उनका नाम गोंडवाना विश्वविद्यालय के समक्ष प्रस्तावित किया।
इसके बाद विश्वविद्यालय ने उन्हें तीन महीने के अनुबंध पर समन्वयक के रूप में नियुक्त किया है। इस पद के लिए उन्हें 30 हजार रुपये प्रतिमाह मानधन दिया जाएगा।
ग्रामसभाओं को उनके अधिकारों के प्रति करेंगे जागरूक
‘एकल’ उपक्रम के तहत भूपति की भूमिका केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर ग्रामसभाओं के साथ समन्वय करने और आदिवासी समुदाय को उनके संवैधानिक तथा कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है।
विशेष रूप से पेसा कानून और वन अधिकार कानून के तहत ग्रामसभाओं को मिलने वाले अधिकारों की जानकारी ग्रामीणों तक पहुंचाई जाएगी। आदिवासी और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए वन अधिकारों से संबंधित दावे दाखिल करना कई बार जटिल प्रक्रिया होती है। आवश्यक दस्तावेजों की कमी या दावों में त्रुटियों के कारण कई आवेदन लंबित रह जाते हैं।
भूपति ऐसे मामलों में ग्रामीणों को आवश्यक दस्तावेज जुटाने, दावे तैयार करने, आवेदन में मौजूद कमियों को दूर करने और संबंधित प्रशासनिक विभागों तक दावे पहुंचाने में समन्वय करेंगे।
वन अधिकार के दावों में भी करेंगे मदद
वन अधिकार कानून के तहत पात्र आदिवासी और अन्य पारंपरिक वन निवासी अपने अधिकारों के लिए दावा कर सकते हैं। हालांकि, दावा प्रक्रिया में दस्तावेज, ग्रामसभा की भूमिका और प्रशासनिक स्तर पर होने वाली प्रक्रिया को लेकर ग्रामीणों में कई बार पर्याप्त जानकारी नहीं होती।
भूपति अपने क्षेत्रीय अनुभव के आधार पर ग्रामीणों को इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी देंगे। उनका काम ग्रामसभा और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित करने का भी होगा, ताकि पात्र लोगों के दावों को सही तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
1,119 में से 532 ग्रामसभाओं का सशक्तीकरण
गोंडवाना विश्वविद्यालय के ‘एकल’ उपक्रम के तहत जिले में ग्रामसभाओं को सशक्त बनाने का काम पहले से जारी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिले की 1,119 ग्रामसभाओं में से 532 ग्रामसभाओं का सशक्तीकरण किया जा चुका है।
इस पहल का उद्देश्य ग्रामीणों को उनके अधिकारों, सरकारी योजनाओं और ग्रामसभा की भूमिका के प्रति जागरूक करना है। भूपति की नियुक्ति से इस अभियान को आदिवासी बहुल और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
हथियार से अधिकारों की लड़ाई तक का सफर
भूपति का यह बदलाव केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि उनके जीवन में आए बड़े परिवर्तन का उदाहरण भी है। जिन जंगलों में वे कभी हथियार के साथ सक्रिय थे, अब उन्हीं इलाकों में वे आदिवासी ग्रामीणों को कानूनी अधिकारों की जानकारी और दस्तावेजी प्रक्रिया में मदद करते नजर आएंगे।
हथियार के रास्ते से लोकतंत्र की मुख्यधारा में लौटने के बाद अब समाज के अधिकारों के लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से काम करने की उनकी नई भूमिका उनके पुनर्वास की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
अब चुनौती यह होगी कि भूपति अपने पुराने अनुभव और क्षेत्र की जानकारी का इस्तेमाल करते हुए कितनी प्रभावी तरीके से ग्रामसभाओं को सशक्त बना पाते हैं और आदिवासी ग्रामीणों के लंबित अधिकारों तथा दावों को प्रशासनिक स्तर तक पहुंचाने में कितनी भूमिका निभाते हैं।
ब्युरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज…