1.68 लाख के ट्रक का ऑर्डर, 2.50 लाख का माल पहुंचने का दावा; देसाईगंज किसान मोर्चे में विधायक रामदास मसराम ने भी यूरिया की कीमतों को लेकर उठाए सवाल
गढ़चिरौली ब्युरो : जिले में खाद की बिक्री को लेकर कृषि विभाग के दावों और कृषि केंद्र संचालकों की शिकायतों के बीच अब नया विवाद खड़ा हो गया है। एक ओर कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि खाद के साथ दूसरी कृषि निविष्ठाओं की अनधिकृत लिंकिंग पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी, वहीं दूसरी ओर दावा किया जा रहा है कि लिंकिंग की भाषा बदल गई है। अब सीधे लिंकिंग नहीं, बल्कि ‘मदद करो’ कहकर अतिरिक्त खाद और कृषि दवाइयां लेने का दबाव बनाया जा रहा है।
दुकानदारों का कहना है कि उन्हें भी अपनी दुकानदारी चलानी है। यदि वे थोक विक्रेता से लिंकिंग वाले खाद या अन्य कृषि निविष्ठाएं नहीं लेते, तो उन्हें खाद का भाव नहीं दिया जाता या उसे वेटिंग पर रखा जाता है। एक संचालक ने दावा किया कि 1 लाख 68 हजार रुपये के एक ट्रक का ऑर्डर देने के बावजूद करीब 2 लाख 50 हजार रुपये का माल भेजा जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि दुकानदार अतिरिक्त माल का क्या करे और उसका खर्च आखिर किस पर डाले?
कृषि विभाग ने कहा- अनधिकृत लिंकिंग मिली तो कार्रवाई
31 अगस्त 2026 को कृषि विभाग की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गया कि जिले में किसानों को उचित दर पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराने के लिए नियमित निगरानी और जांच की जा रही है। किसानों को उनकी जरूरत से अधिक अन्य खाद अथवा कृषि निविष्ठाएं खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
कृषि विभाग के अनुसार जिले के लिए 21,500 मीट्रिक टन यूरिया का आवंटन किया गया है, जबकि अब तक 22,400 मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध हो चुका है। विभाग ने खाद कंपनियों और विक्रेताओं को अनधिकृत लिंकिंग नहीं करने के निर्देश दिए हैं।
विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई खाद कंपनी, थोक विक्रेता या कृषि सेवा केंद्र संचालक खाद के साथ अन्य कृषि निविष्ठाएं खरीदने के लिए मजबूर करता पाया गया, तो जांच के बाद खाद नियंत्रण आदेश, 1985 के तहत कार्रवाई की जाएगी।
सवाल- ‘लिंकिंग’ खत्म हुई या सिर्फ शब्द बदला?
कुछ लोगों का कहना है कि विभाग द्वारा कार्रवाई की बात कही जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग है। जानकारी के अनुसार पहले सीधे ‘लिंकिंग’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, जबकि अब ‘मदद करो’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
उनका सवाल है कि यदि खाद कंपनियां या थोक विक्रेता बिना किसी लिंकिंग के केवल जरूरत के मुताबिक खाद उपलब्ध करा रहे हैं, तो फिर एक ट्रक के ऑर्डर और वास्तविक रूप से आने वाले माल की कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
कृषि केंद्र संचालकों ने खाद लिंकिंग के मुद्दे को लेकर कृषि आयुक्त के नाम आवेदन भी दिया था। उनका कहना है कि हर साल आवेदन किए जाते हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। उनका कहना है कि यदि विभाग ने इस समस्या का कोई ठोस समाधान निकाला है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि ‘लिंकिंग’ का मुद्दा ही खत्म हो।
दूरदराज इलाकों में 150 से 400 रुपये तक ज्यादा वसूली का आरोप
गढ़चिरौली जिला मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। किसानों को समय पर खाद और दवाइयों की जरूरत होती है। ऐसे में किसानों का आरोप है कि कई स्थानों पर खाद की कीमत निर्धारित दर से 150 से 400 रुपये तक अधिक वसूली जा रही है।
किसानों का कहना है कि मजबूरी में उन्हें अतिरिक्त रकम देनी पड़ती है, क्योंकि समय पर खाद नहीं मिली तो फसल प्रभावित होने का डर रहता है। कई बार किसानों को खाद की खरीद का बिल भी नहीं दिया जाता। ऐसे में अधिक रकम वसूलने का कोई पुख्ता सबूत किसान के पास नहीं रहता।
देसाईगंज के किसान मोर्चे में विधायक रामदास मसराम ने भी उठाया मुद्दा
31 अगस्त 2026 को देसाईगंज में कांग्रेस की ओर से किसानों की विभिन्न समस्याओं को लेकर उपविभागीय कार्यालय पर मोर्चा निकाला गया था। इस दौरान आरमोरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक रामदास मसराम ने भी खाद की कीमतों को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
विधायक मसराम ने आरोप लगाया कि 266 रुपये की कीमत वाला यूरिया किसानों को 1,500 रुपये तक अधिक रकम लेकर बेचा जा रहा था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब मामला गर्म होता है तो कुछ समय के लिए स्थिति नियंत्रित दिखाई देती है, लेकिन माहौल शांत होते ही फिर वही स्थिति शुरू हो जाती है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कृषि विभाग का कहना है कि जिले में पर्याप्त यूरिया उपलब्ध है और अधिक दर या अनधिकृत लिंकिंग की शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी।
‘चेकिंग’ हो तो सामने आएगी असली तस्वीर?
किसानों का कहना है कि विभाग को केवल शिकायत या समाचार सामने आने के बाद रिकॉर्ड जांचने के बजाय यदि गांव-गांव जाकर यह जांच की जाए कि कौन सा खाद किस कीमत पर बेचा जा रहा है और किसान से वास्तव में कितनी रकम ली जा रही है, तो जमीनी हकीकत सामने आ सकती है
बिल नहीं मिलने से किसान के पास सबूत भी नहीं
किसानों का कहना है कि कई बार खाद खरीदते समय उन्हें बिल नहीं दिया जाता। ऐसे में यदि निर्धारित दर से अधिक रकम ली जाती है, तो शिकायत करने के लिए उनके पास ठोस दस्तावेजी सबूत नहीं रहता। किसानों का कहना है कि फसल बचाने की मजबूरी में उन्हें 200 या 500 रुपये अतिरिक्त देने पड़ें, तो भी खाद लेना ही पड़ता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि कृषि विभाग के दावों और किसानों-कृषि केंद्र संचालकों की शिकायतों के बीच वास्तविकता क्या है? क्या जिले में केवल रिकॉर्ड के आधार पर जांच होगी या विभाग जमीनी स्तर पर औचक जांच कर खाद की वास्तविक बिक्री दर और कथित लिंकिंग का सच सामने लाएगा? इस पर अब किसानों की निगाहें टिकी हुई हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़..