सरकारी भाव ₹266, किसान से ₹400 तक वसूली का आरोप; बिल मांगने पर खाद नहीं, ‘ट्रांसपोर्टिंग चार्ज’ के नाम पर अतिरिक्त रकम
गढ़चिरौली,ब्यूरो : गढ़चिरौली जिले की कोरची तहसील में खाद की बिक्री को लेकर किसानों और कृषि केंद्र संचालकों के बीच चल रहा कथित ‘रेट खेल’ अब सवालों के घेरे में है। किसानों का आरोप है कि कृषि केंद्रों पर खाद की सरकारी निर्धारित कीमत कुछ और है, जबकि किसान से वसूली जाने वाली रकम कुछ और। किसानों के अनुसार विभिन्न प्रकार की खाद की एक बोरी पर ₹134 से लेकर ₹300 तक अतिरिक्त रकम लिए जाने की चर्चा है। यूरिया, डीएपी, कृषिधन, कृषिदेव, ईको सहित अन्य खादों की कीमत भी सरकारी दर से अधिक वसूले जाने का आरोप किसानों की ओर से लगाया जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि किसान से कथित तौर पर अधिक रकम लेने के बावजूद सरकारी बिल में बिक्री निर्धारित सरकारी दर पर ही दिखाई जाती है, जिससे कागजों पर किसान की कथित लूट दिखाई ही नहीं देती।
₹266 की यूरिया ₹400 में—आखिर अतिरिक्त ₹134 किस बात के?
किसानों के मुताबिक यूरिया की निर्धारित कीमत करीब ₹266 होने के बावजूद कुछ कृषि केंद्रों पर यही खाद कथित रूप से ₹400 तक में बेची जा रही है। यानी एक बोरी पर करीब ₹134 अतिरिक्त वसूले जाने का आरोप है। किसानों का कहना है कि यही स्थिति अन्य खादों में भी बताई जा रही है और खाद के प्रकार के अनुसार अतिरिक्त वसूली ₹134 से ₹300 तक होने की चर्चा है। किसान जब बड़ी मात्रा में खाद खरीदता है तो एक बोरी पर लगने वाली अतिरिक्त रकम कई बोरियों में बदलकर उसके लिए सैकड़ों या हजारों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाती है। खेती में पहले ही बीज, मजदूरी, कीटनाशक, डीजल और सिंचाई का खर्च बढ़ा हुआ है, ऐसे में खाद पर भी कथित अतिरिक्त वसूली किसानों की मुश्किल और बढ़ा रही है।
कृषि केंद्र संचालक का तर्क—‘सरकारी भाव हमें नहीं पड़ता’
किसानों का कहना है कि जब वे कृषि केंद्र संचालक से सवाल करते हैं कि “सरकारी रेट अलग है और आप ज्यादा कीमत पर खाद क्यों बेच रहे हैं?” तो कुछ संचालकों की ओर से कथित तौर पर जवाब दिया जाता है कि “हमें सरकारी भाव में खाद नहीं पड़ती, ट्रांसपोर्टिंग वगैरह का चार्ज लगता है, इसलिए हमें इसी कीमत पर बेचना पड़ता है।” किसानों के अनुसार यही तर्क देकर उनसे सरकारी दर से अधिक रकम ली जाती है। यदि वास्तव में परिवहन या अन्य खर्च के नाम पर अतिरिक्त राशि ली जा रही है तो सवाल यह उठता है कि उस अतिरिक्त रकम का स्पष्ट उल्लेख बिल में क्यों नहीं किया जाता? क्या खाद की बिक्री के लिए विभागीय नियमों में इस तरह अलग से परिवहन शुल्क वसूलने की अनुमति है? और यदि अनुमति है तो उसकी दर, रसीद और हिसाब क्या है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब किसानों को आज तक नहीं मिल रहा है।
‘ट्रांसपोर्टिंग का खर्च हमारा, लेकिन किसान का सवाल—दुकान तक माल कौन लाता है?’
कृषि केंद्र संचालक यदि यह कहते हैं कि उन्हें खाद लाने में ट्रांसपोर्टिंग का खर्च उठाना पड़ता है, तो किसानों ने भी अब सीधा सवाल खड़ा किया है। जब कृषि केंद्र संचालक को ट्रांसपोर्टिंग का चार्ज देना पड़ता है तो किसान अपनी खाद खरीदने के लिए कृषि केंद्र तक पहुंचने में जो पैसा खर्च करता है, उसका चार्ज कौन देगा? किसान का कहना है कि वह पहले ही अपनी जेब से कृषि केंद्र तक पहुंचने का किराया या वाहन का खर्च करता है। इसके बाद भी यदि दुकानदार अपनी परिवहन लागत किसान से अलग से वसूलता है तो यह दोहरा बोझ किसान पर क्यों डाला जा रहा है? किसानों का कहना है कि अगर हर व्यापारी अपनी दुकान तक माल पहुंचाने का खर्च ग्राहक से मनमाने तरीके से वसूलने लगे तो फिर सरकारी निर्धारित दर का अर्थ ही क्या रह जाएगा?
असली सवाल—किसान से लिए ₹400, बिल में फिर ₹266 क्यों?
किसानों द्वारा लगाया गया सबसे गंभीर आरोप सरकारी बिल को लेकर है। किसानों का कहना है कि यदि किसान से किसी खाद की बोरी के लिए ₹400 लिए जाते हैं, तो सरकारी बिल बुक में कथित रूप से वही बिक्री ₹266 के सरकारी रेट पर दिखाई जाती है। इसी तरह अन्य खादों में भी किसान से वास्तविक रूप से ली गई रकम और बिल में दर्ज रकम के बीच अंतर होने का आरोप है। अगर ऐसा हो रहा है तो केवल बिल बुक देखकर किसी अधिकारी को यह पता नहीं चलेगा कि किसान की जेब से वास्तव में कितने रुपये निकले। यही वजह है कि किसान कह रहे हैं कि ‘कागजों में सब साफ, लेकिन किसान की जेब में हिसाब अलग।’ इस आरोप की सच्चाई सामने लाने के लिए विभाग को केवल दुकानदार के रिकॉर्ड पर भरोसा करने के बजाय सीधे किसानों से जानकारी लेने की जरूरत है।
बिल मांगने वाला किसान क्यों डरता है?
किसानों के अनुसार, जब कोई किसान पूरी रकम का बिल मांगता है या पूछता है कि सरकारी रेट से अधिक पैसा किस बात का लिया जा रहा है, तो कुछ कृषि केंद्र संचालक कथित रूप से उसे खाद देने से ही इनकार कर देते हैं। किसानों के मुताबिक उन्हें यह तक कहा जाता है कि “बिल चाहिए तो खाद नहीं मिलेगी।” खेती के समय खाद की जरूरत तत्काल होती है। किसान यदि उसी समय खाद नहीं खरीद पाया तो उसकी फसल प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसी मजबूरी के कारण किसान कथित तौर पर ज्यादा पैसे देने के बावजूद चुप रहना पसंद करता है। किसानों का कहना है कि शिकायत करने का डर और खाद की जरूरत—इन दोनों के बीच किसान फंस गया है।
मामला सिर्फ कोरची का नहीं—दूरदराज के इलाकों में भी यही शिकायत?
किसानों का कहना है कि सरकारी रेट और वास्तविक बिक्री कीमत के बीच अंतर की यह समस्या केवल कोरची तहसील तक सीमित नहीं है। गढ़चिरौली जिले के दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में भी खाद की कीमत को लेकर इसी तरह की शिकायतें और चर्चाएं सुनने को मिलती हैं। जहां किसान कृषि केंद्रों पर निर्भर हैं और विकल्प कम हैं, वहां कथित मनमानी का असर ज्यादा दिखाई देता है। जिले के दुर्गम क्षेत्रों में परिवहन का खर्च अधिक होने का तर्क भी दिया जाता है, लेकिन किसानों का सवाल है कि यदि परिवहन खर्च वास्तव में नियमों के तहत लिया जा रहा है तो उसकी पारदर्शी रसीद क्यों नहीं दी जाती और किसानों को इसकी स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जाती?
अधिकारी का जवाब—‘दुकानदार का नाम बताओ, कार्रवाई करेंगे’
जब किसान खाद की अधिक कीमत की शिकायत लेकर कृषि विभाग तक पहुंचने की कोशिश करते हैं तो किसानों के अनुसार अधिकारियों की ओर से अक्सर यह जवाब मिलता है कि “दुकानदार का नाम बताओ, हम उसके खिलाफ कार्रवाई करेंगे।” लेकिन किसानों का सवाल है कि जब कोई किसान दुकानदार का नाम बताने से ही डर रहा हो तो क्या विभाग अपनी जिम्मेदारी खत्म कर सकता है? किसान चाहते हैं कि अधिकारी शिकायतकर्ता किसान का इंतजार करने के बजाय स्वयं गांव-गांव जाकर वास्तविक स्थिति जानें। कृषि केंद्रों की जांच के साथ किसानों से अलग-अलग और गोपनीय तरीके से पूछा जाए कि उन्होंने किस खाद के लिए कितनी रकम दी और उन्हें किस कीमत का बिल मिला।
अगर गांव-गांव किसान से पूछा जाए तो ‘दूध का दूध, पानी का पानी’

किसानों का कहना है कि यदि कृषि विभाग वास्तव में खाद की बिक्री में पारदर्शिता चाहता है तो उसे केवल कृषि केंद्र संचालक द्वारा दिखाए गए दस्तावेजों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अधिकारी यदि हर गांव में जाकर खाद खरीदने वाले किसानों की राय लें, उनसे वास्तविक भुगतान की जानकारी लें और उसे दुकानदार के बिल व स्टॉक रिकॉर्ड से मिलाएं, तो कथित अतिरिक्त वसूली की सच्चाई सामने आ सकती है। किसानों के मुताबिक इस तरीके से यह पता लगाना मुश्किल नहीं होगा कि सरकारी रेट पर वास्तव में खाद बिकी है या किसान से अतिरिक्त रकम ली गई है। तब ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो सकता है कि असली गड़बड़ी कहां है और कौन जिम्मेदार है।
जांच दुकानदार की ही क्यों, किसान की भी सुनिए
किसानों का कहना है कि जांच का मतलब सिर्फ दुकान पर जाकर बिल बुक देखना नहीं होना चाहिए। यदि विभाग पहले से जानता है कि दुकानदार सरकारी रेट पर बिक्री दिखा सकता है, तो फिर वास्तविकता जानने का सबसे आसान तरीका किसानों से पूछताछ करना है। किस गांव के किसान ने कौन सी खाद खरीदी, कितनी बोरी खरीदी, कितने रुपये दिए और उसे कितना बिल मिला—इन सभी जानकारियों का मिलान किया जाए तो कथित रेट के खेल की तस्वीर सामने आ सकती है। किसानों की मांग है कि ऐसी जांच गोपनीय तरीके से हो, ताकि शिकायत करने वाले किसान को बाद में खाद खरीदने में किसी तरह की परेशानी या कथित दबाव का सामना न करना पड़े।
हर साल चर्चा, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं
कोरची तहसील के किसानों का कहना है कि खाद की अधिक कीमत वसूले जाने की चर्चा हर साल खेती के सीजन में सामने आती है। किसान आपस में इसकी चर्चा करते हैं, लेकिन शिकायत करने के डर और खाद की जरूरत के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाता। यदि यह समस्या लगातार सामने आ रही है तो कृषि विभाग को इस बार केवल औपचारिक कार्रवाई नहीं बल्कि पूरे जिले में खाद बिक्री की जमीनी जांच और पारदर्शी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए। क्योंकि किसानों के अनुसार समस्या केवल एक दुकान या एक गांव की नहीं, बल्कि दूरदराज क्षेत्रों में भी इसकी शिकायतें सुनने को मिल रही हैं।
अब सवाल सिर्फ खाद की कीमत का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का है
यदि सरकारी रेट पर खाद उपलब्ध है तो किसान से ₹134 से ₹300 तक अतिरिक्त रकम क्यों ली जा रही है? यदि अतिरिक्त रकम ट्रांसपोर्टिंग चार्ज के नाम पर ली जा रही है तो उसका नियम क्या है, उसकी रसीद कहां है और बिल में उसका उल्लेख क्यों नहीं? यदि किसान से ₹400 लिए गए तो सरकारी बिल में ₹266 ही क्यों दिखाई जाए? और यदि किसान बिल मांगता है तो कथित रूप से उसे खाद देने से इनकार क्यों किया जाता है?
इन सवालों का जवाब केवल दुकानदार से पूछने से नहीं, बल्कि किसान की आवाज सुनकर मिलेगा। अब किसानों की नजर कृषि विभाग पर है कि वह केवल यह कहकर मामला खत्म करेगा कि “दुकानदार का नाम बताओ, कार्रवाई करेंगे”, या फिर खुद गांव-गांव जाकर किसानों से पूछेगा और खाद की बिक्री की वास्तविक स्थिति सामने लाएगा। यदि विभाग जमीनी स्तर पर जांच करता है तो किसानों के अनुसार सरकारी रेट, वास्तविक वसूली और बिल के बीच का पूरा अंतर साफ हो सकता है।
ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़..