अंधश्रद्धा बनी मौत का कारण: 9 महीने की गर्भवती मां और नवजात बच्ची की दर्दनाक मौत

गढ़चिरौली जिले के कोरची तहसील के हुडुकदुमा गांव में एक बेहद हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहां 9 महीने की गर्भवती महिला और उसकी नवजात बच्ची की मौत हो गई। इस घटना ने जहां पूरे क्षेत्र को शोक में डुबो दिया है, वहीं अंधश्रद्धा और समय पर इलाज न मिलने की गंभीर समस्या को भी उजागर कर दिया है।

मृत महिला की पहचान रमुला महेश काटेंगे (उम्र 24 वर्ष, निवासी हुडुकदुमा) के रूप में हुई है। जानकारी के मुताबिक, रमुला गर्भावस्था के अंतिम चरण में थी। दो दिन पहले ही वह जांच के लिए कोरची ग्रामीण अस्पताल पहुंची थी, जहां डॉक्टरों ने उसका ब्लड प्रेशर काफी ज्यादा होने के कारण तुरंत भर्ती होने की सलाह दी थी। हालांकि, उसने डॉक्टरों की सलाह को नजरअंदाज कर दिया और घर लौट गई।

बताया जा रहा है कि इसके बाद वह कथित मांत्रिक बाबा के पास चली गई और झाड़-फूंक व अंधश्रद्धा का सहारा लिया। इसी कारण समय पर सही इलाज नहीं हो सका और उसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई।

सोमवार तड़के करीब 3 बजे उसे प्रसव पीड़ा शुरू हुई, साथ ही पानी भी निकलने लगा और पैरों में भारी सूजन आ गई। परिजन उसे तत्काल एंबुलेंस से कोरची ग्रामीण अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अस्पताल में भर्ती करते ही डॉक्टरों ने उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल इलाज शुरू किया। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. स्मिता उके के अनुसार, महिला का ब्लड प्रेशर 240 तक पहुंच गया था, शरीर में ऑक्सीजन का स्तर केवल 30 प्रतिशत रह गया था और पेट में पानी जमा हो गया था। उसे तुरंत इंजेक्शन और ऑक्सीजन दिया गया, लेकिन उपचार के दौरान ही महज 15 मिनट में उसकी मौत हो गई।

डॉक्टरों के अनुसार, गर्भ में पल रही बच्ची की मौत महिला को अस्पताल लाने से पहले ही हो चुकी थी। बाद में जांच में यह स्पष्ट हुआ कि उसके पेट में नौ महीने की मृत बच्ची थी।

इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था और जनजागरूकता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने “मेरा गांव स्वस्थ गांव” योजना की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है। बावजूद इसके, कोरची जैसे दूरदराज क्षेत्रों में आज भी लोग अस्पताल और डॉक्टरों के बजाय अंधविश्वास और भोंदू बाबाओं पर अधिक भरोसा करते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आज भी झाड़-फूंक और बुआबाजी का चलन कायम है, जिससे कई बार मरीजों की जान चली जाती है। यह घटना इसी कड़वी सच्चाई को सामने लाती है।

फिलहाल, मामले में कोरची पुलिस थाने में मर्ग क्रमांक 04/2026 के तहत धारा 194 बीएनएसएस के अंतर्गत केस दर्ज किया गया है और आगे की जांच जारी है।

यह दर्दनाक घटना एक बार फिर यह संदेश देती है कि अंधश्रद्धा से दूर रहकर समय पर चिकित्सा सलाह लेना कितना जरूरी है, वरना छोटी सी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़..

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