गांव के विकास पर ठेकेदारों का कब्जा!

पंचायत बनी सिर्फ कागजी एजेंसी? सरपंच-ग्रामसेवक से कथित सांठगांठ के आरोप; सड़क, नाली और भवन निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल

गढ़चिरौली ब्यूरो : ग्राम पंचायतों को गांव के विकास की सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय संस्था माना जाता है। ग्रामीणों की मूलभूत जरूरतों से जुड़े अधिकांश छोटे-बड़े विकास कार्य ग्राम पंचायतों के माध्यम से ही मंजूर और क्रियान्वित किए जाते हैं। लेकिन गढ़चिरौली जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों को लेकर अब एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है—क्या पंचायत के विकास कार्य वास्तव में पंचायत के नियंत्रण में हो रहे हैं, या फिर ठेकेदारों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है?

आरोप है कि कई जगहों पर ग्राम पंचायत से कार्यों के ठराव और प्रस्ताव मंजूर करवाने के बाद वास्तविक निर्माण कार्य ठेकेदारों के माध्यम से कराया जाता है। ऐसे में पंचायत केवल कागजों पर कार्यान्वयन एजेंसी दिखाई देती है, जबकि काम की पूरी प्रक्रिया पर ठेकेदारों का प्रभाव होने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

सबसे बड़ा सवाल अब निर्माण की गुणवत्ता और सरकारी राशि के उपयोग को लेकर उठ रहा है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र की मजबूरी अब बहाना नहीं

गढ़चिरौली जिला लंबे समय तक नक्सलवाद की समस्या से प्रभावित रहा है। जिले के कई दुर्गम और अतिदुर्गम गांवों तक अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों और जांच टीमों की नियमित पहुंच चुनौतीपूर्ण रही। सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के कारण कई विकास कार्यों की निगरानी भी प्रभावित होती थी।

लेकिन अब परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। जिले के अनेक क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच बढ़ी है और नक्सल गतिविधियों पर नियंत्रण मजबूत हुआ है। इसके बावजूद यदि ग्रामीण विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर वही पुराने सवाल कायम हैं, तो यह निश्चित रूप से गंभीर विषय है। अब सवाल यह है कि जब सुरक्षा की पुरानी बाधाएं कम हो रही हैं, तो विकास कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार क्यों दिखाई नहीं दे रहा?

पंचायत के नाम पर काम, मैदान में ठेकेदार?

ग्रामीण क्षेत्रों में सीमेंट-कंक्रीट सड़क, नाली, सार्वजनिक भवन, शौचालय, सभागृह और अन्य सिविल निर्माण कार्यों के लिए ग्राम पंचायत के माध्यम से प्रस्ताव तैयार किए जाते हैं। कार्यों को मंजूरी मिलने के बाद निर्माण प्रक्रिया शुरू होती है।

लेकिन ग्रामीणों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई स्थानों पर ग्राम पंचायत का नाम सामने रहता है, जबकि वास्तविक काम ठेकेदारों के माध्यम से कराया जाता है।

यदि ऐसा है तो यह जांच का विषय है कि—

  • कार्य का वास्तविक निष्पादन कौन कर रहा है?
  • पंचायत के प्रस्ताव के बाद ठेकेदार की भूमिका कैसे तय हुई?
  • क्या निर्धारित नियमों और प्रक्रिया का पालन हुआ?
  • क्या निर्माण कार्य तकनीकी एस्टीमेट के अनुसार किया गया?
  • काम पूरा होने से पहले और बाद में तकनीकी निरीक्षण हुआ या नहीं?
  • माप पुस्तिका में दर्ज काम वास्तव में जमीन पर उसी गुणवत्ता का है या नहीं?

इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।

एस्टीमेट में कुछ और, जमीन पर कुछ और?

किसी भी सरकारी निर्माण कार्य के लिए तकनीकी एस्टीमेट तैयार किया जाता है। सड़क की लंबाई-चौड़ाई, मोटाई, इस्तेमाल होने वाली सामग्री, सीमेंट की मात्रा, गिट्टी, रेत, लोहे और अन्य सामग्री का मानक निर्धारित किया जाता है।

लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में शिकायत है कि कई बार एस्टीमेट में निर्धारित मानकों के बजाय लागत कम करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।

सीमेंट-कंक्रीट सड़क में पर्याप्त मोटाई नहीं होना, निर्धारित अनुपात में सामग्री का इस्तेमाल न होना, नाली की दीवार कमजोर होना या निर्माण में घटिया सामग्री इस्तेमाल होना जैसे आरोप सामने आते रहे हैं।

ऐसे मामलों में केवल सड़क या नाली बन जाने को विकास नहीं माना जा सकता। सवाल यह है कि वह निर्माण कितने वर्षों तक टिकेगा और उसके लिए खर्च की गई सरकारी राशि का वास्तविक लाभ ग्रामीणों को कितने समय तक मिलेगा?

‘कमीशन’ के आरोप भी गंभीर

सबसे गंभीर आरोप कथित ‘प्रतिशत’ और लेनदेन को लेकर लगाए जा रहे हैं। कुछ ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि विकास कार्यों की कुल स्वीकृत राशि में विभिन्न स्तरों पर कथित हिस्सेदारी तय होने के बाद ही काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जांच की मांग करने वाले आरोप के रूप में देखा जाना चाहिए।

अगर किसी विकास कार्य में सरकारी राशि का अवैध लेनदेन होता है और उसका असर निर्माण की गुणवत्ता पर पड़ता है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सीधे ग्रामीणों के अधिकार और सार्वजनिक धन की सुरक्षा से जुड़ा मामला बन जाएगा।

ठेकेदार को फायदा, ग्रामीणों को नुकसान?

मान लीजिए किसी गांव में सड़क बनाने के लिए सरकारी राशि मंजूर हुई। सड़क बन गई, बिल पास हो गया और रिकॉर्ड में काम पूरा दिखा दिया गया। लेकिन यदि कुछ समय बाद सड़क टूटने लगे तो सबसे ज्यादा नुकसान किसका होगा?

ग्रामीणों का।

बारिश में सड़क खराब होगी तो आवागमन प्रभावित होगा। नाली टूटेगी तो पानी की निकासी की समस्या पैदा होगी। सार्वजनिक भवन कमजोर होगा तो उसकी मरम्मत पर फिर सरकारी पैसा खर्च होगा।

यानी एक बार सरकारी राशि खर्च होने के बावजूद यदि काम टिकाऊ नहीं है, तो भविष्य में उसी समस्या के समाधान के लिए दोबारा सरकारी धन खर्च करना पड़ सकता है।

ग्रामसभा की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

ग्राम पंचायत के विकास कार्यों में ग्रामसभा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उनके गांव में कौन-सा काम मंजूर हुआ है, कितनी राशि मंजूर हुई है, एस्टीमेट क्या है, काम की अवधि कितनी है और निर्माण की जिम्मेदारी किसकी है।

यदि यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो और ग्रामीण निर्माण कार्य के दौरान ही सवाल पूछ सकें, तो घटिया काम पर समय रहते रोक लगाई जा सकती है।

सिर्फ बिल पास होना पर्याप्त नहीं

किसी भी विकास कार्य की सफलता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि उसका बिल पास हो गया या रिकॉर्ड में काम पूरा दिख रहा है।

असल परीक्षा तो निर्माण स्थल पर होती है।

सड़क की वास्तविक मोटाई क्या है?
कंक्रीट में सामग्री का अनुपात क्या है?
नाली की गहराई और चौड़ाई एस्टीमेट के अनुसार है या नहीं?
भवन में निर्धारित सामग्री का इस्तेमाल हुआ या नहीं?
काम की गुणवत्ता की तकनीकी जांच किसने की?

इन सभी सवालों की जवाबदेही तय होना जरूरी है।

अब चाहिए ‘कागजी जांच’ नहीं, जमीनी जांच

गढ़चिरौली जैसे जिले में ग्रामीण विकास की राशि बेहद महत्वपूर्ण है। दूरदराज के गांवों में सड़क, नाली, पुलिया, स्कूल भवन और अन्य बुनियादी सुविधाएं लोगों के जीवन से सीधे जुड़ी हैं।

इसलिए प्रत्येक शिकायत पर केवल कार्यालयीन रिकॉर्ड देखने के बजाय अचानक स्थल निरीक्षण, तकनीकी गुणवत्ता परीक्षण, माप पुस्तिका की जांच, भुगतान रिकॉर्ड की जांच और ग्रामसभा के सामने कार्यों का सामाजिक ऑडिट किया जाना चाहिए।

यदि किसी कार्य में अनियमितता मिलती है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि शिकायत गलत साबित होती है तो संबंधित शिकायत के तथ्यों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

बड़ा सवाल—गांव का विकास किसके लिए?

ग्राम पंचायत का पैसा किसी व्यक्ति, ठेकेदार या अधिकारी का पैसा नहीं है। यह जनता का पैसा है और जनता के विकास के लिए खर्च किया जाता है।

इसलिए सवाल किसी एक पंचायत या किसी एक ठेकेदार तक सीमित नहीं है। सवाल पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही का है।

नक्सलवाद के दौर में दूरदराज इलाकों तक अधिकारियों की पहुंच मुश्किल थी, लेकिन अब जब परिस्थितियां बदल रही हैं, तो क्या ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों की निगरानी भी बदलेगी?

क्या पंचायतें वास्तव में ग्रामीणों के हाथ में रहेंगी या विकास कार्यों पर ठेकेदारों का प्रभाव कायम रहेगा?

और सबसे बड़ा सवाल—

सरकारी खजाने से पैसा गांव के विकास के लिए निकल रहा है, तो जमीन पर उसका असर क्यों नहीं दिखाई देता?

इन आरोपों की वास्तविकता सामने लाने के लिए संबंधित ग्राम पंचायतों के कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच और जिम्मेदार अधिकारियों, सरपंच, ग्रामसेवक तथा संबंधित ठेकेदारों का पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़…

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