गडचिरोली जिले के भामरागढ़ तहसील के अतिदुर्गम दर्भा क्षेत्र से एक बेहद दर्दनाक और व्यवस्था की पोल खोलने वाली घटना सामने आई है। यहां जंगली सूअरों के लगातार बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों में दहशत फैला दी है। ईस हमले में मुल्ला चैतू पिडसे व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे समय पर इलाज दिलाने के लिए ग्रामीणों को बांस की कावड़ बनाकर कंधों पर ढोते हुए जंगल और पहाड़ी रास्तों से मुख्य सड़क तक लेजाना पड़ा।
जानकारी के मुताबिक, दर्भा क्षेत्र के निवासी मुल्ला चैतु पिडसे (उम्र 50 वर्ष) तेंदूपत्ता सीजन की तैयारी के तहत जंगल में दोरी (रस्सी) लाने के लिए गए थे। सुबह करीब साढ़े नौ बजे धोडराज जंगल में अचानक एक जंगली सूअर ने उस पर हमला कर दिया। सूअर ने सीधे उनके पेट पर वार किया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल होकर मौके पर ही गिर पडा। साथ में मौजूद अन्य लोगों ने शोर मचाकर और पत्थर फेंककर किसी तरह सूअर को वहां से भगाया, लेकिन तब तक पिडसे खून से लथपथ हो चुका था।
घटना के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी घायल को अस्पताल तक पहुंचाना। इलाके में सड़क न होने के कारण एंबुलेंस मौके तक नहीं पहुंच सकती थी। ऐसे में ग्रामीणों ने तत्काल सूझबूझ दिखाते हुए बांस और कपड़े की मदद से एक कावड़ (अस्थायी स्ट्रेचर) तैयार की और घायल को उसमें बांधकर करीब एक किलोमीटर तक ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों और जंगलों से पैदल चलकर मुख्य सड़क तक ले कर गये। इस दौरान कई जगहों पर रास्ता इतना कठिन था कि ग्रामीणों को खुद भी संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा था। मुख्य सड़क पर पहुंचने के बाद एंबुलेंस की मदद से उन्हें भामरागढ़ के ग्रामीण अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार जारी है।
इस घटना को 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि उसी क्षेत्र में एक और हमला सामने आया। गांव की मादी टुगे पुंगाटी (45 वर्ष) पर भी जंगली सूअर ने हमला कर दिया, जिसमें उनके दाहिने पैर में गंभीर चोट आई। उन्हें भी उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लगातार दो दिनों में हुई इन घटनाओं ने पूरे इलाके में भय का माहौल पैदा कर दिया है।
दरअसल, इस समय तेंदूपत्ता संग्रहण का मौसम शुरू होने वाला है, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण सुबह 4 बजे से ही जंगलों में काम करने निकल जाते हैं और दोपहर तक वहीं रहते हैं। ऐसे में जंगली जानवरों के हमले का खतरा और बढ़ जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि हर बार जान जोखिम में डालकर काम करना उनकी मजबूरी बन गई है।
स्थानीय लोगों ने वन विभाग और प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र में वन्यजीवों की गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए जाएं। साथ ही घायलों को आर्थिक सहायता और सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई जाए।
यह घटना एक बार फिर इस बात को उजागर करती है कि भामरागढ़ जैसे आदिवासी और दुर्गम इलाकों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। सड़क, स्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाओं की कमी के कारण छोटी-सी घटना भी जानलेवा बन जाती है। विकास के दावों के बीच हकीकत यह है कि यहां के लोगों को आज भी इलाज के लिए कंधों का सहारा लेना पड़ रहा है, जो निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है।
ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़…