अधीक्षिका ने राणू को छुट्टी दी होती, तो शायद बच जाती जान!

आदिवासी आयुक्त आयुषी सिंह के सामने राणू के पिता ने बताई आपबीती; सोनसरी आश्रमशाला की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

गढचिरौली,ब्यूरो : गढ़चिरौली जिले के कुरखेड़ा तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित शासकीय आश्रमशाला, सोनसरी में आठवीं कक्षा की छात्रा राणू कृष्णा हलामी की छात्रावास में पंखे से लटककर मौत होने की घटना ने एक बार फिर जिले की आश्रमशालाओं की व्यवस्था और विद्यार्थियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार शाम करीब 4:30 बजे हुई इस घटना के बाद आश्रमशाला में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के बीच भय और असुरक्षा का माहौल है। इस मामले में छात्रा की तबीयत खराब होने, उसके अभिभावकों द्वारा छुट्टी मांगे जाने और महिला अधीक्षिका दीपाली चामाटे की भूमिका को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। मृतक छात्रा के पिता कृष्णा चिन्नू हलामी ने आदिवासी आयुक्त आयुषी सिंह के समक्ष घटना से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी देते हुए अपना पक्ष रखा। पिता की ओर से सामने रखी गई जानकारी के बाद आश्रमशाला की कार्यप्रणाली, विद्यार्थियों की समस्याओं के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता और छात्रावास में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित प्रशासन इस मामले की जांच में क्या तथ्य सामने लाता है और जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।

दो दिनों से बीमार थी राणू, फोन कर माता-पिता को बुलाया

राणू हलामी मोहगांव की निवासी थी, जो सोनसरी गांव से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित है। वह सोनसरी की शासकीय आश्रमशाला में आठवीं कक्षा में पढ़ाई कर रही थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार, राणू पिछले दो दिनों से सर्दी-खांसी और खराब तबीयत से परेशान थी। परिवार का आरोप है कि आश्रमशाला के शिक्षक या कर्मचारियों ने उसकी तबीयत खराब होने की जानकारी समय पर माता-पिता को नहीं दी। बताया जाता है कि राणू ने किसी दूसरे व्यक्ति के मोबाइल फोन से अपने माता-पिता से संपर्क किया और अपनी तबीयत के बारे में बताकर उन्हें स्कूल बुलाया। इसके बाद माता-पिता आश्रमशाला पहुंचे और बेटी की तबीयत के बारे में जानकारी ली।

घर जाना चाहती थी राणू, अधीक्षिका दीपाली चामाटे से मांगी थीं छुट्टी

जानकारी के अनुसार, राणू ने अपने माता-पिता से कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और वह उनके साथ गांव जाना चाहती है। माता-पिता ने उसे समझाते हुए कहा कि आगे छुट्टियां आने वाली हैं, इसलिए वह बाद में घर आ सकती है। लेकिन राणू अपने माता-पिता के साथ गांव जाने की जिद कर रही थी। बताया जाता है कि जब माता-पिता वहां से जाने लगे, तो राणू भी उनके पीछे-पीछे दौड़ते हुए आश्रमशाला के बाहर तक पहुंच गई। इसके बाद माता-पिता ने महिला अधीक्षिका दीपाली चामाटे से बेटी को छुट्टी देने का अनुरोध किया। आरोप है कि अधीक्षिका ने छुट्टी देने से इनकार कर दिया। हालांकि, इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

शाम 4:30 बजे छात्रावास में हुई घटना, विद्यार्थियों में डर का माहौल

बताया जा रहा है कि इसी घटनाक्रम के बाद शाम करीब 4:30 बजे राणू ने छात्रावास के कमरे में पंखे से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना सामने आते ही आश्रमशाला परिसर में हड़कंप मच गया। आठवीं कक्षा की छात्रा की मौत से वहां पढ़ने वाले अन्य छात्र-छात्राएं भी सहम गए हैं। बच्चों के बीच भय का माहौल पैदा हो गया है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि प्रशासन विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन्हें आवश्यक भावनात्मक सहयोग भी उपलब्ध कराए। पुलिस जांच के जरिए घटना से पहले के घटनाक्रम और संबंधित परिस्थितियों की पड़ताल की जानी चाहिए।

आदिवासी आयुक्त आयुषी सिंह ने किया दौरा, पिता ने रखी अपनी बात

छात्रा की मौत की जानकारी मिलने के बाद आदिवासी विकास विभाग की अपर आयुक्त, नागपुर, आयुषी सिंह ने सोनसरी शासकीय आश्रमशाला का दौरा किया और घटना से जुड़ी परिस्थितियों का जायजा लिया। इसके बाद कुरखेड़ा उपजिला अस्पताल में उन्होंने राणू के परिवार से बातचीत की। इसी दौरान राणू के पिता कृष्णा चिन्नू हलामी ने घटना से संबंधित जानकारी उनके सामने रखी। अब सवाल यह है कि क्या छात्रा की तबीयत खराब होने की जानकारी उसके माता-पिता को समय पर दी गई थी? क्या अभिभावकों ने छुट्टी मांगी थी? यदि छुट्टी देने से इनकार किया गया, तो उसके पीछे क्या कारण था? इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

लगभग 300 विद्यार्थियों वाली आश्रमशाला में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

सोनसरी शासकीय आश्रमशाला में लगभग 300 विद्यार्थी पढ़ाई करते हैं। ऐसे में एक छात्रा की मौत ने छात्रावास में रहने वाले बच्चों की देखभाल, बीमार विद्यार्थियों की निगरानी, अभिभावकों से संपर्क और छुट्टी देने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि कोई विद्यार्थी दो दिनों से बीमार है, तो क्या उसकी स्थिति की नियमित निगरानी की जाती है? क्या जरूरत पड़ने पर अभिभावकों को समय पर सूचना दी जाती है? यदि माता-पिता अपने बीमार बच्चे को घर ले जाना चाहते हैं, तो छुट्टी देने से संबंधित नियमों का पालन किस तरह किया जाता है? राणू की मौत के बाद इन सवालों के जवाब सामने आना बेहद जरूरी है।

आदिवासी बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी?

एक ओर सरकार आदिवासी विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा, आवास और सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आश्रमशालाएं संचालित करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसी दुखद घटनाएं व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती हैं। राणू की मौत के मामले में यह जांच करना जरूरी है कि उसकी बीमारी के दौरान किस तरह की देखभाल की गई, अभिभावकों के आरोपों में कितनी सच्चाई है, छुट्टी देने से इनकार किया गया था या नहीं और घटना से पहले छात्रा की स्थिति को समझने के लिए क्या कदम उठाए गए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राणू की मौत के मामले में निष्पक्ष जांच होगी? क्या महिला अधीक्षिका दीपाली चामाटे और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी? क्या दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होगी? और क्या जिले की अन्य आश्रमशालाओं में भी विद्यार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी?

गढ़चिरौली जिले में आदिवासी बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा के लिए संचालित आश्रमशालाओं में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है। राणू की मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि घटना की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज..

 

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