कुरखेड़ा बना रेत तस्करी का गढ़

घाट ठेका, जुर्माना और “दार बाबा” की चर्चाओं से बढ़े सवाल

गड़चिरोली जिले का कुरखेड़ा तालुका बीते कई वर्षों से रेत तस्करी के लिए कुख्यात होता जा रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि खुलेआम बड़े पैमाने पर अवैध रेत उत्खनन और परिवहन हो रहा है, लेकिन संबंधित विभागों की ओर से ठोस कार्रवाई का अभाव साफ दिखाई देता है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोरों पर है कि राजस्व विभाग को इस पूरे खेल की पूरी जानकारी है, फिर भी अनदेखी की जा रही है, जिससे शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है।

राजस्व विभाग की अनदेखी से धड़ल्ले से जारी अवैध खनन

शासन द्वारा घरकुल योजना सहित अन्य निर्माण कार्यों के लिए रेत उपलब्ध कराने की नीति लागू की गई है, ताकि आम नागरिकों को सस्ती दर पर सामग्री मिल सके। लेकिन कुरखेड़ा तालुका में इस नीति का कोई असर नजर नहीं आता। सती नदी को इस अवैध कारोबार का मुख्य केंद्र माना जा रहा है, जहां से बड़े पैमाने पर रेत का उत्खनन कर बाहरी ठेकेदारों द्वारा विदर्भ के विभिन्न शहरों में सप्लाई की जा रही है। रात के समय नदी किनारे टिप्परों, ट्रकों और ट्रैक्टरों की लंबी कतारें लगती हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि तस्करी बिना किसी डर के जारी है।

जुर्माना लगा, फिर भी वसूली नहीं—प्रशासन पर उठे सवाल

करीब तीन महीने पहले कुरखेड़ा तालुका के दो रेत घाटों का लिलाव तारा मंगल एजेंसी को लगभग 2 करोड़ 25 लाख रुपये की ऊंची बोली पर दिया गया था, जबकि इसका बेस प्राइस मात्र 32 लाख रुपये था। इसके बावजूद नान्ही रेत घाट में 1 करोड़ 46 लाख रुपये का जुर्माना लगाए जाने के बाद भी आज तक यह राशि शासन के खाते में जमा नहीं की गई है। इतने बड़े मामले में भी प्रशासन की चुप्पी कई संदेह पैदा कर रही है और एजेंसी पर मेहरबानी के आरोप लगाए जा रहे हैं।

इसी एजेंसी के नाम पर कुंभीटोला रेत घाट पर भी खनन शुरू किया गया है। 11 अप्रैल को आरमोरी विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक रामदास मसराम ने इस घाट का दौरा किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पाया कि शासन द्वारा निर्धारित 1908 ब्रास की सीमा से अधिक रेत का उत्खनन किया जा रहा है। साथ ही डीमार्केशन के बाहर भी खनन के संकेत मिले। घाट पर सीसीटीवी कैमरे जैसी मूलभूत निगरानी व्यवस्था का अभाव भी सामने आया, जिससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लग गया।

रात में जेसीबी-पोकलैंड से खुला खेल 

कुरखेड़ा तालुका से रेत की तस्करी केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि विदर्भ के बड़े शहरों तक इसका नेटवर्क फैला हुआ है। रात के समय जेसीबी और पोकलैंड मशीनों के जरिए नदी से रेत निकालकर टिप्परों और ट्रैक्टरों में भरकर भेजा जाता है। तस्कर पहले से ‘फील्डिंग’ लगाकर रखते हैं और रास्तों पर निगरानी भी की जाती है। सूत्रों के अनुसार,महसूल विभाग के आशीर्वाद से यह कारोबार चलने की बातें कही जा रही हैं। विरोध करने वालों को धमकाने तक के आरोप भी सामने आ रहे हैं।

ग्राम सेवक की आईडी से 1100 ब्रास रेत की अनुमति, जांच ठंडे बस्ते में

हाल ही में एक और गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें घेवर्धा और घाटी रेत घाट—जो घरकुल लाभार्थियों के लिए आरक्षित थे—वहां ग्राम सेवक की यूजर आईडी और पासवर्ड का दुरुपयोग कर करीब 1100 ब्रास रेत की अनुमति दूसरे ठेकेदार को दे दी गई। यह मामला सामने आने के बावजूद अब तक किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे प्रशासन की कार्यशैली पर और सवाल खड़े हो रहे हैं।
तालुका के सती नदी के अलावा पुराडा, मालेवाड़ा, सोनसरी, घाटी, कढोली, गेवर्धा, आंधळी, नान्ही, वाकळी-मोहगांव और गुरनोली जैसे कई घाटों से लगातार अवैध उत्खनन जारी है। यह स्थिति दर्शाती है कि तस्करी केवल एक-दो स्थानों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे तालुका में फैली हुई है।

चेकपोस्ट के बावजूद नहीं थमी तस्करी, प्रशासन मौन

पिछले वर्ष जिले के जिलाधिकारी ने रेत तस्करी पर रोक लगाने के लिए विभिन्न स्थानों पर चेकपोस्ट स्थापित किए थे, लेकिन इसके बावजूद अवैध उत्खनन पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया। वर्तमान में भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब सब कुछ खुलेआम हो रहा है, तो आखिर राजस्व विभाग और प्रशासन अब भी चुप क्यों है? क्या यह केवल लापरवाही है या इसके पीछे कोई और कारण है—यह जांच का विषय बनता जा रहा है।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़…

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