‘तस्करों का साथ, हमारा विकास’—कुरखेड़ा में चर्चा ने पकड़ा जोर

अवैध रेत तस्करी से हो रहे करोड़ों के काम, कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति का आरोप; तहसीलदार, एसडीएम और तलाठियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

गढचिरौली, ब्युरो : गढ़चिरौली जिले के कुरखेड़ा तहसील में रेत का अवैध उत्खनन और परिवहन कथित रूप से लंबे समय से जारी है। बारिश का मौसम होने के बावजूद रेत तस्करी का सिलसिला पूरी तरह थमता दिखाई नहीं दे रहा है। सती नदी सहित तहसील क्षेत्र के विभिन्न नदी घाटों से कथित तौर पर रेत निकालकर निर्माण कार्यों तक पहुंचाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इस पूरे मामले ने अब राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि एक तरफ सरकार अवैध उत्खनन और रेत तस्करी पर रोक लगाने के लिए नियम और कानून बनाती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इन नियमों का पालन होता दिखाई नहीं दे रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नदी घाटों से अवैध रूप से रेत निकाली जा रही है और उसका परिवहन हो रहा है, तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं है?

आम नागरिकों पर कार्रवाई, बड़े निर्माण कार्यों पर खामोशी क्यों?

कुरखेड़ा शहरवासियों के अनुसार, कोई आम नागरिक अपने घर के निर्माण के लिए नदी से रेत लाता है तो उसके वाहन पर कार्रवाई करने में प्रशासन देर नहीं करता। कई बार सामान्य नागरिकों को नियम-कानून का हवाला देकर रेत परिवहन से रोका जाता है।

लेकिन दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली रेत कहां से आ रही है, इसका सत्यापन कौन कर रहा है? निर्माण स्थलों तक रेत पहुंचाने वाले वाहनों की जांच कौन कर रहा है? इन सवालों का जवाब स्थानीय प्रशासन से मांगा जा रहा है।

शहरवासियों का आरोप है कि यदि आम व्यक्ति के लिए नियम सख्त हैं तो वही नियम बड़े ठेकेदारों और बड़े निर्माण कार्यों पर भी समान रूप से लागू होने चाहिए। कानून की नजर में आम नागरिक और प्रभावशाली व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए।

तहसीलदार, एसडीएम और तलाठियों की भूमिका पर सवाल

रेत और मुरूम के अवैध उत्खनन तथा परिवहन पर नियंत्रण रखने की जिम्मेदारी प्रशासन के संबंधित विभागों की होती है। ऐसे में स्थानीय लोगों का सवाल है कि कुरखेड़ा शहर और तहसील क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों की जानकारी संबंधित अधिकारियों को नहीं मिलती है या फिर जानकारी मिलने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जाती?

तहसीलदार, तलाठी और एसडीएम स्तर के अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि अवैध रेत परिवहन वास्तव में हो रहा है तो नियमित गश्त, वाहन जांच और घाटों की निगरानी क्यों नहीं बढ़ाई जाती? वहीं यदि प्रशासन का दावा है कि अवैध रेत तस्करी नहीं हो रही है तो शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जाती?

बारिश में भी जारी है कथित रेत का कारोबार

आमतौर पर बारिश के मौसम में नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण रेत उत्खनन एवं परिवहन पर प्रभाव पड़ता है। इसके बावजूद कुरखेड़ा तहसील में कथित रूप से रेत का अवैध कारोबार पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश समाप्त होने के बाद सितंबर से जून तक रेत तस्करी का कारोबार और भी बड़े पैमाने पर चलने की आशंका रहती है। इस दौरान नदी घाटों से बड़ी मात्रा में रेत निकालकर अलग-अलग स्थानों पर पहुंचाई जाती है। यदि प्रतिदिन बड़ी मात्रा में रेत का अवैध परिवहन होता है तो इससे सरकार को राजस्व का कितना नुकसान हो रहा है, इसकी जांच होना जरूरी है।

सरकार की तिजोरी को नुकसान, आम जनता पर बोझ

अवैध रेत उत्खनन का सीधा असर सरकारी राजस्व पर पड़ता है। जिस रेत से सरकार को रॉयल्टी और अन्य निर्धारित शुल्क के रूप में राजस्व प्राप्त होना चाहिए, वही रेत यदि बिना अनुमति और बिना वैध प्रक्रिया के बाजार में पहुंचती है तो सरकारी खजाने को नुकसान होता है।

दूसरी ओर सरकार को होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता पर ही पड़ती है। विकास कार्यों के लिए सरकार के पास उपलब्ध संसाधन सीमित होते हैं। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की अवैध लूट पर नियंत्रण नहीं होने से शासन को दोहरा नुकसान उठाना पड़ सकता है—एक तरफ राजस्व की हानि और दूसरी तरफ प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन।

रेत के साथ मुरूम का भी कथित अवैध कारोबार

कुरखेड़ा तहसील में केवल रेत ही नहीं, बल्कि मुरूम के अवैध उत्खनन और परिवहन को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में विभिन्न निर्माण कार्यों के लिए बड़ी मात्रा में मुरूम की आवश्यकता होती है। इसी मांग का फायदा उठाकर कथित रूप से बिना अनुमति मुरूम निकालने और परिवहन करने का कारोबार चलने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

यदि किसी क्षेत्र में लगातार रेत और मुरूम का अवैध उत्खनन हो रहा है तो केवल वाहन पकड़ना ही पर्याप्त नहीं होगा। प्रशासन को यह पता लगाना होगा कि उत्खनन कहां से हो रहा है, किसके आदेश पर हो रहा है, माल किसके पास पहुंच रहा है और इस पूरे कारोबार से आर्थिक लाभ किसे मिल रहा है।

कार्रवाई होती है, लेकिन क्या सिर्फ दिखावे के लिए?

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कभी-कभार अवैध रेत परिवहन के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, लेकिन इसके बाद कुछ दिनों में वही गतिविधियां दोबारा शुरू हो जाती हैं। ऐसे में कार्रवाई की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

यदि कार्रवाई के बाद भी वही वाहन, वही रास्ते और वही घाट दोबारा अवैध गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं तो प्रशासन को कार्रवाई के साथ-साथ पूरे नेटवर्क की जांच करनी चाहिए। केवल वाहन जब्त करने अथवा मामूली दंड लगाने से रेत तस्करी का मूल स्रोत बंद नहीं होगा।

‘तस्करों का साथ, हमारा विकास’—चर्चा ने पकड़ा जोर

कुरखेड़ा में अब स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि अवैध रेत और मुरूम के कारोबार को विकास कार्यों की आड़ मिल रही है। हालांकि इस तरह के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन नागरिकों का कहना है कि बड़े निर्माण कार्यों में इस्तेमाल हो रही रेत की वैधता की जांच प्रशासन को करनी चाहिए।

यदि किसी निर्माण कार्य के लिए इस्तेमाल की जा रही रेत वैध स्रोत से खरीदी गई है तो उसके बिल, रॉयल्टी और परिवहन से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा सकती है। वहीं यदि रेत अवैध स्रोत से आई है तो संबंधित ठेकेदार, वाहन मालिक, आपूर्तिकर्ता और उत्खनन स्थल तक जांच पहुंचाई जानी चाहिए।

प्रशासन करे पारदर्शी जांच

कुरखेड़ा तहसील में रेत और मुरूम के कथित अवैध कारोबार को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अब प्रशासन को देना चाहिए। संबंधित विभाग यदि नियमित जांच कर रहा है तो कितने वाहन पकड़े गए, कितनी रेत जब्त की गई, कितनी रॉयल्टी वसूल की गई और कितने मामलों में आपराधिक कार्रवाई की गई—इन आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

साथ ही संवेदनशील नदी घाटों की निगरानी बढ़ाने, अवैध उत्खनन वाले स्थानों की पहचान करने और निर्माण स्थलों तक पहुंच रही रेत के स्रोत की जांच करने की जरूरत है।

कुरखेड़ा के नागरिकों का सीधा सवाल है कि जब आम आदमी के लिए रेत परिवहन के नियम इतने सख्त हैं, तो बड़े पैमाने पर रेत की आवाजाही और निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली रेत की निगरानी आखिर कौन कर रहा है?

अब देखना यह होगा कि इन गंभीर आरोपों और सवालों के बाद प्रशासन जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या फिर रेत तस्करी को लेकर उठ रही आवाजें भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाती हैं।

ब्यूरो रिपोर्ट सिंदूर न्यूज़..

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